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व्यास मेंशन, 

स्नेहा अपने मॉम डैड के साथ व्यास मेंशन आ चुकी थी। इस वक्त वो अपनी बहन आस्था के साथ उसके रूम में थी। स्नेहा की फैमिली में उसके मॉम डैड मिस्टर महेश और मिसेज अनुपमा के अलावा उसकी बहन आस्था और भाई आयुष थे…

 आयुष स्नेहा से बड़ा था लेकिन आस्था स्नेहा से छोटी थी... सब लोग स्नेहा से बहुत प्यार करते थे….. बस उसकी दादी निरंजना देवी को छोड़कर जो स्नेहा से इसलिए उखड़ी उखड़ी रहती थी क्योंकि वो थोड़ा लड़खड़ा कर चलती थी.... और स्नेहा की इसी कमी की वजह से बहुत सारे लड़कों ने उसका रिश्ता भी ठुकराया था, जिसकी वजह से उसकी दादी स्नेहा से और भी ज्यादा चिढ़ने लगी थी इसीलिए अब स्नेहा जब पग फेरे की रस्म के लिए घर पर आई तो वो अपनी दादी से मिलने उनके रूम में भी गई लेकिन उसकी दादी ने उसकी तरफ देखा तक नहीं! 

लेकिन बाकी सब लोग स्नेहा को बहुत प्यार करते थे और खासकर उसके डैड, महेश जी! 

आस्था स्नेहा के अंगद के बारे में पूछ रही थी। वो उससे पूछ रही थी कि कल रात उन दोनों के बीच क्या कुछ हुआ लेकिन स्नेहा ने उसे गुस्से से घूरा तो आस्था चुप रह गई पर कुछ देर बाद आस्था उसे छेड़ते हुए बोली "लगता है कल जीजू ने आपसे बहुत सारा प्यार किया होगा…. तभी आप मुझे कुछ बात नहीं रही है! आपको शर्म आ रही है ना..”

 उसकी बात पर स्नेहा को कल रात की बात याद आ गई। कल रात वो और अंगद एक तो हुए लेकिन उसमें प्यार कहा था?? ये सवाल वो भी खुद से पूछ रही थी! 

यूं ही धीरे-धीरे वक्त बीत रहा था और अब सुबह से दोपहर हो चुकी थी! स्नेहा अभी खाना खाकर फ्री ही हुई थी कि उसके फोन पर संगम का कॉल आया!

 उसने मुस्कुराते हुए कॉल रिसीव किया तो सामने से संगम की आवाज आई “ये क्या बात हुई स्नेहा मां… आप मुझे अकेला छोड़ कर चली गई? आपने तो कहा था कि अब आप मेरे साथ रहेंगी, मुझे छोड़कर कभी नहीं जाएंगी तो फिर आप मुझे अकेला छोड़कर कैसे चली गई?”

 उसके सवालों पर स्नेहा मुस्कुराई और बोली "सॉरी बेटा लेकिन बस आज मुझसे ये गलती हो गई… आई प्रॉमिस, आइंदा मैं आपको छोड़कर कभी नहीं जाऊंगी और आप फिकर मत कीजिए, अभी कुछ ही देर में मैं वापस आपके पास आ जाऊंगी!”

 संगम तुरंत बोला “नहीं… आप अभी इसी वक्त मेरे पास आओ! मुझे आप अभी इसी वक्त अपने पास चाहिए हो!”

 उसकी बात सुनकर स्नेहा हंसने लगी। तभी फोन शारदा जी ने अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए बोली "कैसी हो बेटा?”

 स्नेहा मुस्कुराई और बोली "मैं ठीक हूं सासू मां..”

 शारदा जी एक बार फिर से बोली "तुम फिकर मत करो, अभी एक डेढ़ घंटे में ही अंगद तुम्हें लेने आ जाएगा, तब तक मैं इसे संभाल लूंगी!”

 स्नेहा मुस्कुराते हुए बोली "ठीक है!”

 शारदा जी ने फोन काट दिया और संगम को खाना खिलाने लगी जो खाना खाने से मना कर रहा था क्योंकि उसे स्नेहा के हाथों से खाना था!

 कुछ ही देर में किसी तरह उन्होंने संगम को खाना खिला ही दिया था और अब उन्होंने अंगद को कॉल किया लेकिन अंगद का कॉल लग ही नहीं रहा था तो उन्होंने तकरीबन आधे घंटे बाद अंगद की पर्सनल असिस्टेंट को कॉल किया…..

 जिसने उन्हें बताया कि अंगद अपनी एक मीटिंग के लिए देहरादून गया है। उसके देहरादून जाने की बात सुनकर ही शारदा जी हैरान रह गई क्योंकि आज तो अंगद को स्नेहा को लेने व्यास मेंशन जाना था।

 अब उनके चेहरे पर गुस्सा झलकने लगा था। जब सुमित्रा जी ने उन्हें यूं देखा तो वो परेशान होते हुए बोली "क्या हुआ दीदी? आप ऐसे गुस्सा क्यों हो रही है? अंगद से बात हुई क्या… क्या कहा अंगद ने?” 

शारदा जी गुस्से से बोली "अंगद से बात तो तब होगी ना जब वो ऑफिस में होगा! वो ऑफिस में है ही नहीं सुमित्रा…. वो अपनी मीटिंग के लिए देहरादून गया है! बताओ… अब इस लड़के का मैं क्या करूं? इसने खुद कहा था कि मैं स्नेहा को लेने के लिए उसके घर चला जाऊंगा! अगर मुझे पहले पता होता कि इसे मीटिंग के लिए बाहर जाना है तो मैं आज स्नेहा को भेजती ही नहीं… आज उसके पगफेरे की रसम है, कितना बुरा लगेगा उसे… जब अंगद उसे लेने नहीं जाएगा!”

शारदा जी की बात सुनकर अब सुमित्रा जी भी सोच में पड़ गई।

कुछ सोचते हुए वो बोली "आप एक कम कीजिएगा दीदी….आप ध्रुव के साथ स्नेहा को लेने चली जाइयेगा! अगर कोई भी नहीं गया तो उसे और भी ज्यादा बुरा लगेगा....”

शारदा जी तुरंत बोली “लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है सुमित्रा?  तुम भी जानती हो जब मित्तल मेंशन की बहुएं पहली बार अपने मायके जाती है, तो उन्हें उनके पति ही लेने जाते हैं! जैसे ध्रुव आभा को लेने गया था, तुम्हें लेने किशोर और मुझे लेने के लिए धीरज जी! स्नेहा को लेने भी अंगद को जाना होगा.. मुझे नहीं लगता वो आज देहरादून से वापस आ पाएगा इसलिए आज की रात तो स्नेहा को वहीं रुकना पड़ेगा पर समझ नहीं आ रहा कि मैं उसे कहूंगी क्या? वो बेचारी बच्ची, कितना बुरा लगेगा उसे!”

ये बोलते हुए शारदा जी का चेहरा बहुत मायूस हो चुका था।

सुमित्रा जी भी मायूसी से बोली "लेकिन हम कुछ कर भी तो नहीं सकते ना दीदी! स्नेहा के मायके तो अंगद ही जा सकता है और अंगद तभी वहां जा पाएगा, जब वो देहरादून से वापस आएगा!” 

वहीं दूसरी तरफ 

स्नेहा मुस्कुराते हुए अपना सामान पैक कर रही थी।

 कुछ सामान था जरूरी जो विदाई के वक्त छूट गया था। वो उन्हें एक सूटकेस में डाल रही थी और उसमें उसकी फैमिली फोटो भी थी... तभी उसकी नजर सामने वॉल क्लॉक पर गई जहां पर 7 बज चुके थे! 

वो मुस्कुराते हुए खुद से ही बोली "किसी भी वक्त वो आते होंगे…. मैं ये सारा सामान लेकर नीचे चली जाती हूं!”

ये बोलकर उसने वो बैग बंद किया और फिर नीचे की तरफ आ गई, जहां उसकी मॉम ने पहले ही शगुन का सामान तैयार कर रखा था… जो स्नेहा के साथ जाने वाला था!”

स्नेहा हैरानी से बोली "ये सब क्या है मॉम?”

 अनुपमा जी तुरंत बोली "ये सब शगुन का समान है, तुम अपने साथ लेकर जाओगी! शादी के बाद पहली बार आई हो… खाली हाथ थोड़ा ना जाओगी?”

 उनकी बात सुनकर स्नेहा मुस्कुराई। तभी अनुपमा जी एक बार फिर से बोली “तुम्हारी अंगद जी से बात हुई क्या? वो कब तक आने वाले हैं?”

 स्नेहा उनके सवाल पर कुछ बोल ही नहीं पाई। उसे खुद नहीं पता था कि अंगद उसे लेने कब आएगा हालांकि उसके पास अंगद का नंबर था और उसने शादी से पहले एक बार उसके नंबर पर कॉल भी किया था लेकिन सामने से अंगद ने डिस्कनेक्ट कर दिया था और बस एक मैसेज छोड़ दिया था “आई विल कॉल यू लेटर!”

 उसके बाद ना कभी उसका मैसेज आया और ना ही कभी स्नेहा ने किया! 

तकरीबन एक घंटा और बीत गया और अब तक स्नेहा की दादी जी भी डिनर के लिए बाहर की तरफ आ चुकी थी।

उन्होंने जब स्नेहा को देखा तो तुरंत बोली "क्या बात है? तुम अभी तक गई नहीं… कहीं ऐसा तो नहीं की शादी के एक ही दिन में तुम्हारे ससुराल वालों को समझ में आ गया कि तुम किसी काम की नहीं और पगफेरे की रस्म के नाम पर उन लोगों ने तुम्हें तुम्हारे मायके में ही पटक दिया!”

 उनकी बात सुनकर स्नेहा के दिल पर क्या बीत रही थी ये सिर्फ वही जानती थी? लेकिन वो हल्का सा मुस्कुराई और बोली "ऐसा कुछ नहीं है दादी जी… वो मुझे लेने आएंगे! सासू मां ने कहा था कि वो शाम तक आ जाएंगे तो बस अभी आते ही होंगे!”

 ये बोलते हुए उसने दरवाजे की तरफ देखा.. उसकी आंखों में नमी तैयार गई थी।

अनुपमा जी तुरंत बोली "आप क्यों स्नेहा से ऐसी बात करती हैं मां..”

इसके आगे वो कुछ कहती, उससे पहले ही निरंजना जी गुस्से से बोली "तुम तो मेरे सामने जुबान मत ही चलाओ तो ज्यादा बेहतर होगा? पता नहीं कैसी लड़की पैदा की है, ढंग से चला भी नहीं जाता… किसी का घर क्या संभालेगी?”

 ये बोलकर वो अंदर की तरफ चली गई और अनुपमा जी अब स्नेहा की तरफ देखने लगी….

स्नेहा मुस्कुराते हुए बोली "आप फिकर मत कीजिए मॉम… आपको तो पता ही है दादी मां ऐसे बोलती ही है, पर मैं सच बता रही हूं मैं सब कुछ संभाल लूंगी… आप बस मुझ पर यकीन करना!”

 ये बोलते हुए वो अनुपमा जी के पास आ गई थी। अनुपमा जी ने उसके गाल पर अपना हाथ रखा और बोली "मुझे मेरी बेटी पर पूरा यकीन है… जरूरी तो नहीं जिसके कदम डगमगाए वो कुछ कर नहीं सकती, दुनिया तो उनकी भी होती है, जिनके पैर नहीं होते... मेरी बेटी में तो बस हल्की सी कमी है और उसके साथ-साथ इतनी खूबियां भी तो है, देखने वाले की नजर अच्छी होगी तो वो कमी खूबियों के सामने दिखाई ही नहीं देगी।”

कुछ देर बाद

 डिनर का वक्त हो गया था और सब लोग डिनर कर रहे थे... मिस्टर व्यास ने अंगद को कॉल किया लेकिन अंगद ने कॉल रिसीव ही नहीं किया तो उन्होंने दोबारा अंगद को कॉल भी नहीं किया, वो अपनी बेटी को पूरी जिंदगी भी अपने घर पर रख सकते थे लेकिन उनसे स्नेहा का मायूस चेहरा देखा नहीं जा रहा था...

तभी स्नेहा आस्था की तरफ देखते हुए बोली “हम दोनों बाहर गार्डन में थोड़ा घूमने चले क्या?”

 आस्था मुस्कुराई और बोली “क्यों नहीं दीदी? चलो ना बाहर चलते हैं... थोड़ी वॉक भी हो जाएगी!”

 ये बोलकर अब वो दोनों डाइनिंग टेबल से उठी और बाहर की तरफ चली गई... 

अनुपमा जी मिस्टर व्यास की तरफ देखते हुए बोली “आपकी अंगद जी से बात हुई क्या?”

 मिस्टर व्यास ने अपना चेहरा ना में हिलाया और बोले “नहीं… मैंने कॉल किया था लेकिन उसने कॉल रिसीव ही नहीं किया!”

उनकी बात सुनकर अब अनुपमा जी को भी परेशानी होने लगी! तभी आयुष बोला “क्या हुआ?? आप लोग इतना परेशान क्यों हो रहे हैं? अगर अंगद किसी काम में बिजी होगा तो नहीं आ पाया होगा, आज नहीं तो कल वो स्नेहा को लेने आ ही जाएगा! मुझे नहीं लगता हमें ऐसे परेशान होने की जरूरत है!”

 अनुपमा जी और मिस्टर व्यास आयुष की बात समझ रहे थे लेकिन अभी भी उन दोनों के चेहरे पर परेशानी तो झलक रही थी।

वहीं दूसरी तरफ

 स्नेहा और आस्था दोनों बाहर गार्डन एरिया में थे लेकिन आस्था वॉक करने की बजाय साइड में खड़ी फोन पर बात करने में लगी हुई थी जबकि स्नेहा की नजरे बार-बार दरवाजे पर जा रही थी... 

ना चाहते हुए भी उसकी आंखों में आंसू आ रहे थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे अब तक तो सिर्फ उसे देखकर रिजेक्ट किया जाता था…. अब शायद इतना सब कुछ होने के बाद भी वो रिजेक्ट हो गई है... 

अचानक ही अब उसका चेहरा एकदम से खिल गया, जब एक लग्जरियस गाड़ी व्यास मेंशन के अंदर एंटर हुई और उस गाड़ी में से अंगद बाहर निकला।

 अंगद को देखते ही स्नेहा का चेहरा एकदम से खिल गया था। वो तेज कदमों से उसके पास आ रही थी हालांकि उसके कदम लड़खड़ा रहे थे लेकिन ऐसा लग रहा था, जैसे वो अपने कदमों को भी हराना चाहती हो।

 वो अंगद के सामने आकर खड़ी हुई और अंगद ने फोन से नजरे हटाकर उसकी तरफ देखा। 

वो कुछ बोलता, उससे पहले ही स्नेहा बोली “मैं कब से आपका इंतजार ही कर रही थी? मुझे लगा शायद आप नहीं आएंगे!”

उसकी बात सुनकर अंगद तुरंत बोला "मैंने कहा था ना एक बार जिस चीज के लिए मैं कमिटमेंट दे दूं… मैं वो चीज जरूर करता हूं! मैंने कहा था तुमसे कि मैं तुम्हें लेने आऊंगा तो मुझे आना ही था… अब जल्दी से गाड़ी में बैठो!”

 स्नेहा हैरानी से बोली “लेकिन आप अंदर तो चलिए…. मेरा मतलब है आप आप किसी से मिले…”

अंगद एक गहरी सांस लेकर बोला "मैं यहां पर सिर्फ तुम्हें लेने आया हूं… किसी से मिलने जुलने नहीं और रही बात मिलने की तो मुझे ये सब चीजें नहीं पसंद इसलिए जल्दी से गाड़ी में बैठो, मेरे पास टाइम नहीं है वेस्ट करने को!”

स्नेहा को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे? वो ऐसे कैसे अपने मॉम डैड से मिले बिना ही अंगद के साथ जा सकती थी…

 कब से सब लोग अंगद का इंतजार कर रहे थे और अब अंगद आया भी तो सबसे मिले बिना जा रहा था!

अंगद दोबारा गाड़ी में बैठ गया लेकिन जब स्नेहा गाड़ी में नहीं बैठी तो अंगद ने अब गाड़ी का विं

डो डाउन किया और स्नेहा की तरफ देखते बोला “बैठोगी गाड़ी में या फिर जाने का इरादा नहीं है? अगर ऐसा है तो बता दो... मैं तो जाऊं? यहां पर ऐसे तुम्हे देखते रहने के लिए तो नहीं आया हूं मैं....”

स्नेहा उसकी बात सुनकर एक बार फिर से बस उसकी तरफ देखती ही रह गई।

व्यास मेंशन 

स्नेहा हैरानी से अंगद की तरफ देख रही थी, जो गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठा था और स्नेहा को भी गाड़ी में बैठने के लिए कह रहा था।

 वो पगफेरे की रस्म में स्नेहा को लेने के लिए व्यास मेंशन आया था लेकिन एक बार भी वो अंदर नहीं गया और ना ही स्नेहा के मॉम डैड से मिला... वो तो स्नेहा को भी यूं ही गाड़ी में बैठने के लिए बोल रहा था लेकिन स्नेहा ऐसे कैसे अपनी मॉम डैड से मिले बिना उसके साथ जा सकती थी?

 तभी आस्था वहां पर आई। उसने जैसे ही अंगद को देखा। वो तुरंत बोली "जीजू आप आ गए… कब से दीदी आपका ही इंतजार कर रही थी? सिर्फ दीदी ही क्यों हम सब लोग भी आपका वेट कर रहे थे… चलिए जल्दी से अंदर चलिए!”

ये बोलते हुए वो अंगद को देख रही थी और अंगद ने अब एक नजर स्नेहा को देखा। स्नेहा भी धीमी से बोली "आस्था सच कह रही है… सब लोग आपका इंतजार कर रहे थे!! अगर आप 5 मिनट…”

उसकी बात पूरी होती उससे पहले ही अंगद बोला "मैंने कहा ना मुझे इंपॉर्टेंट काम है…. अगर तुम्हें टाइम लगेगा तो मुझे बता दो!! मैं ड्राइवर को भेज दूंगा!”

 उसकी बात सुनकर आस्था हैरान रह गई। वो स्नेहा की तरफ देखने लगी तो स्नेहा हल्का सा मुस्कुराई और बोली "तुम्हारे जीजू फिर कभी आएंगे आस्था… अभी फिलहाल के लिए उन्हें एक इंपॉर्टेंट मीटिंग में जाना है, मैं काम करती हूं… मैं जल्दी से अपना सामान लेकर आती हूं और मॉम डैड को भी बाय बोल देती हूं… आप 2 मिनट तो इंतजार कर लेंगे ना मेरा?”

ये बोलते हुए उसने अब वापस अंगद की तरफ देखा। अंगद ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी पॉकेट से फोन निकाल कर वापस अपना फोन चलाने लगा। आस्था भी ये सब देखकर हैरान थी लेकिन अब स्नेहा ही कुछ नहीं बोल रही थी तो वो कैसे ही कुछ बोल सकती थी?

 स्नेहा जल्दी से अंदर की तरफ आई। उसकी स्पीड अभी भी बहुत ज्यादा तेज थी। आस्था तुरंत बोली "दीदी धीरे चलिए ना, आप इतनी तेज क्यों चल रही है?”

 स्नेहा अब उसे क्या ही बताती कि वो क्यों तेज चल रही है!! वो नहीं चाहती थी कि अंगद यहां से बिना उसे लिए ही चला जाए, वो नहीं चाहती थी कि किसी को भी कोई बात बनाने का मौका मिले… वो जल्दी से अंदर की तरफ़ आई, जहां सब लोग हाल में बैठे थे और सब को अंगद का ही इंतजार था।

 स्नेहा हल्का सा मुस्कुराई और अपनी मॉम की तरफ देखते हुए बोली "मम्मा ये मुझे लेने के लिए आए हैं, वो तो अंदर आ रहे थे लेकिन फिर अचानक से उन्हें एक इंपॉर्टेंट कॉल आ गया तो उन्हें जाना पड़ रहा है इसलिए मैं भी चलती हूं!!”

अनुपमा जी हैरानी से बोली "लेकिन कम से कम वो चाय नाश्ता…”

स्नेहा मुस्कुराई और बोली "फिर कभी मम्मा.. वो कह रहे थे कि वो फुर्सत में आएंगे…”

मिस्टर व्यास भी तुरंत बोले “हो सकता है सच में अंगद को कोई काम हो… वो वैसे भी बहुत ज्यादा बिजी रहता है! एक काम करो अनुपमा ये सारा शगुन तुम उनकी गाड़ी में रखवा दो!”

 उनकी बात सुनकर अनुपम जी ने अपना चेहरा हां में हिलाया! 

उन्होंने जल्दी से सारा सामान बाहर की तरफ भिजवाया और फिर खुद भी स्नेहा के साथ बाहर आई। उन्होंने मुस्कुराते हुए अंगद से अंदर आने के लिए कहा लेकिन अंगद ने सामने से ढंग का जवाब भी नहीं दिया!!

 वो ना ही अपनी गाड़ी से उतरा और ना ही उसने अनुपम जी के पैरों को छुआ। इस वक्त स्नेहा को बहुत अजीब लग रहा था।

वो जानती थी कि अनुपमा जी ये सब चीज नोटिस करेंगी लेकिन स्नेहा की खुशी के लिए उन्होंने कुछ नहीं कहा और कुछ ही देर में स्नेहा वहां से चली गई। 

इस वक्त स्नेहा अंगद के साथ गाड़ी में बैठी थी। गाड़ी में ना ही कोई म्यूजिक चल रहा था और ना ही कोई बात कर रहा था!! एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था और स्नेहा को ये चीज बहुत अजीब लग रही थीn उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो अंगद से बात करे तो क्या करें? 

वो बात की शुरुआत करने के इरादे से अंगद की तरफ देखते हुए बोली "आपको आने में इतनी देरी क्यों हो गई?”

अगले ही पल अंगद ने बिना किसी खास एक्सप्रेशंस के जवाब दिया “मैं लेने आ गया ना… कमिटमेंट लेने आने की थी, टाइम नहीं दिया था मैंने तुम्हें.. जो शिकायत कर रही हो!”

 स्नेहा तुरंत बोली "में शिकायत नहीं कर रही हूं… मैं सिर्फ आपसे पूछ रही हूं कि आपको देरी क्यों हुई? मैं बस जानना चाहती थी…”

अंगद ने अचानक की गाड़ी की ब्रेक लगा दी। स्नेहा एकदम हैरान रह गई। उसका दिल जोरो से धक-धक करने लगा था।

 अंगद ने उसकी तरफ देखते हुए बोला "पहली बात… कभी इस बात में इंटरफेयर करने की कोशिश मत करना कि मैं कब, कहां जाता हूं और कहां नहीं और दूसरी बात… सिर्फ मुझसे उतना ही मतलब रखो जितना जरूरी है.. मुझसे अगर कोई शिकायत है तो मेरे सामने कहो!! अगर जेनुइन हुई तो पूरी कर दूंगा और अगर कोई ऐसी वैसी ख्वाहिश दिल में होगी तो बेशक से कुछ भी हो जाए… मेरी तरफ से वो पूरी नहीं होगी!” 

स्नेहा उसकी तरफ देखती ही रह गई और अब अंगद ने एक बार फिर से गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। कुछ ही देर में वो लोग मित्तल मेंशन पहुंचे। 

स्नेहा गाड़ी से बाहर निकली और अंगद के गाड़ी से बाहर आने का इंतजार करने लगी। अंगद गाड़ी में बैठा फोन पर किसी से बात कर रहा था।

 स्नेहा दो-तीन मिनट अपनी जगह पर खड़ी रही और फिर अंगद बाहर निकला… तब तक  सर्वेंट गाड़ी से सारा सामान अंदर की तरफ ले गए थे।

 स्नेहा बाहर इसलिए खड़ी थी क्योंकि वो अंगद के साथ अंदर जाना चाहती थी लेकिन जब अंगद गाड़ी से बाहर निकला तो वो बिना स्नेहा को अपने साथ लिए ही अंदर की तरफ बढ़ गया। स्नेहा ने उसे अंदर जाते हुए देखा। बेशक से ये छोटी-छोटी चीजें थी लेकिन ये छोटी-छोटी चीजें भी उसके लिए मैटर करती थी। 

उसका और अंगद का रिश्ता हुआ था तो अंगद ने साफ-साफ बोल दिया था कि वो ये शादी सिर्फ और सिर्फ संगम के लिए कर रहा है हालांकि उसने कहा था कि वो स्नेहा की हर एक जरूरत पूरी करेगा लेकिन स्नेहा को अंदाजा नहीं था कि उसकी बातों का मतलब ये होगा!!

 उसने अपनी मम्मा से इन सब बातों का जिक्र किया भी था… तब अनुपम जी ने बस उसे यही कहा कि “धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा…”

लेकिन अब स्नेहा को समझ नहीं आ रहा था कि वो शुरुआत कहां से करें क्योंकि वो अंगद से बात करने की कोशिश भी करती थी तो अंगद सामने से जवाब ही नहीं देता था और देता भी तो ऐसा कि सामने से स्नेहा कुछ बोलने लायक ही नहीं रहती थी! 

एक गहरी सांस लेकर वो अब अंगद के पीछे-पीछे घर के अंदर आई तो अंदर आते ही उसकी नजर डाइनिंग टेबल पर गई। 

सब लोग डिनर कर रहे थे! स्नेहा को देखते ही सबका चेहरा खिल गया था।

 शारदा जी मुस्कुराते हुए उसके पास आई और बोली "मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी.. आओ बैठो डिनर करो!”

 उनकी बातें सुनते हुए स्नेहा की नजरे अंगद को ढूंढ रही थी लेकिन अंगद डाइनिंग टेबल पर नहीं था।  वो अंदर आते ही सीधा अपने रूम में चला गया था।

वो धीरे से बोली "क्या ये डिनर नहीं करेंगे..मेरा मतलब है!”

 उसकी बात पूरी होती उससे पहले ही शारदा जी मुस्कुराते हुए बोली "रात को वो ज्यादातर खाना बाहर ही खाकर आता है इसलिए डिनर हमारे साथ नहीं करता।”

 स्नेहा की नजरे अब संगम को ढूंढने लगी। संगम भी वहां नहीं था।

 शारदा जी उसकी नजरों का मतलब समझते हुए बोली "वो सो गया है। सुबह स्कूल जाता है तो रात को थक जाता है इसलिए जल्दी सो जाता है.. तुम आओ तुम डिनर करो!”

 स्नेहा तुरंत बोली "सासू मां मुझे भूख नहीं है वो मुझे मां ने बहुत कुछ खिला दिया था…”

 शारदा जी मुस्कुराते हुए बोली "तो फिर तुम एक काम करो… जाओ जाकर अपने रूम में आराम करो!”

स्नेहा ने मुस्कुराते हुए अपना सर हां में हिलाया और एक नजर सबको मुस्कुरा कर देखते हुए अपने रूम में वापस आ गई।

 आते ही उसकी नज़रें अंगद पर गई, जो वॉशरूम से बाहर निकल रहा था। वो अपने कपड़े चेंज करने के लिए वॉशरूम में गया था और अब वो सीधा उस ड्रॉर के पास आया, जहां पर उसने स्नेहा के लिए दवाइयां रखी थी....

 वहां जाकर उसने उस टैबलेट का कार्ड बिल्कुल वैसा ही रखा हुआ देखा… जैसा वो छोड़कर गया था तो उसकी नज़रें स्नेहा की तरफ चली गई।

 स्नेहा अंदर आई और एक नजर उसकी तरफ देखते हुए बोली "मैंने ये दवाई नहीं ली!”

अंगद गुस्से से बोला “क्यों?”

स्नेहा धीमे से बोली "मुझे नहीं लगता, मुझे ये दवाई लेने की जरूरत है!! मेरा मेरा मतलब है हम दोनों की शादी हुई है तो अगर मैं प्रेग्नेंट…”

 उसकी बात पूरी होती उससे पहले ही अंगद गुस्से से बोला "बिल्कुल भी नहीं! सोचना भी मत! तुम प्रेग्नेंट बिल्कुल भी नहीं हो सकती!” 

उसकी बात सुनकर स्नेहा हैरानी से उसकी तरफ देखने लगी. वो तुरंत बोली "लेकिन..”

 अंगद गुस्से से चिल्लाया “लेकिन वेकिन कुछ भी नहीं, एक बार मैंने कह दिया ना कि तुम कंसीव नहीं कर सकती, मतलब नहीं कर सकती!”

 ये बोलते हुए वो साइड टेबल पर रखा हुआ पानी का गिलास उठाकर उसके पास आया और उसने वो दवाइयां और पानी दोनों स्नेहा की तरफ बढ़ा दिया। उसका गुस्सा देखकर ही स्नेहा की आंखों में नमी तैर गई थी।

 वो एक बार फिर से बोली "पर सुनिए...  मैं आपकी बीवी हूं… अगर मैं प्रेग्नेंट हो भी जाती हूं तो क्या हर्ज है?” 

अंगद गुस्से से दांत पीते हुए बोला "मतलब तुम ये दवाइयां नहीं लोगी?” 

स्नेहा को समझ नहीं आया कि आखिर वो क्या ही कहे? 

वो तुरंत बोली "अगर आपको मुझे ये दवाइयां ही देनी थी तो फिर आप मेरे साथ…”

उसकी बात पूरी होती उससे पहले ही अंगद बोला "गलती हो गई. बहुत बड़ी गलती हो गई लेकिन आइंदा ये गलती नहीं होगी! मुझे लगा मैंने तुमसे शादी की है तो तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करना मेरा फर्ज है लेकिन लगता है तुम इन सब चीजों का फायदा उठाना चाहती हो! बट अंगद मित्तल ना दूसरों का फायदा उठाता है और ना ही किसी दूसरे को अपना फायदा उठाने देता है!”

ये बोलकर अगले ही पल उसने उन दवाइयां को साइड में फेंका और पिलो उठाकर सोफे की तरफ बढ़ गया। स्नेहा को तो कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

अंगद के स्टेप की वजह से पहले ही पता चल चुका था कि कल उन दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ… अब शायद आगे वैसा कुछ नहीं होगा! स्नेहा उसकी तरफ देखती  ही रह गई और अंगद ने अब लाइट तक ऑफ कर दी थी।

 उसका गुस्सा देखकर स्नेहा को बुरा भी लग रहा था और समझ में भी नहीं आ रहा था कि आखिर अंगद के दिमाग में है क्या? क्यों स्नेहा को वो नो प्रेगनेंसी पिल्स देना चाहता है? 

धीमे-धीमे कदमों से वो भी आगे की तरफ आई और बिना कपड़े चेंज किये ही बिस्तर पर सो गई। लाइट ऑफ थी तो अंधेरे में उसे कुछ दिखाई दे ही नहीं रहा था तो वो कपड़े कहा से चेंज करती।

 तकरीबन आधा पौना घंटा वो यूं ही अंगद की तरफ देखती रही… डिम लाइट में उसका चेहरा तो दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन किसी उम्मीद में स्नेहा जागती रही और फिर कुछ देर बाद वो गहरी नींद में चली गई!

 सुबह का वक्त 

स्नेहा की आंखें खुली तो उसकी नजर एक बार फिर से सोफे पर गई लेकिन अंगद आज भी वहां से गायब था…. अब तो स्नेहा को पहले से ही पता था कि वो जरूर जिम गया होगा!

 स्नेहा अपने कपड़े लेकर वॉशरूम गई और फिर कुछ देर बाद शावर लेकर बाहर आई। जब वो ड्रेसिंग की तरफ जा रही थी तो उसने नीचे गिरी हुई वो पिल्स देखी और फिर उन्हें उठाकर वापस ड्रॉर में रख दिया!!

हल्का सा मेकअप और बालों को संवार कर वो नीचे की तरफ आई और सीधा किचन की तरफ बढ़ गई।

 एक सर्वेंट संगम के लिए दूध रेडी कर रही थी। उसने वो दूध का गिलास लिया और संगम के रूम की तरफ बढ़ गई। जैसे ही उसने संगम को उठाना चाहा अचानक ही किसी और ने संगम को अपनी गोद में उठा लिया... 

स्नेहा हैरानी से अंगद को देखने लगी। वही अंगद गुस्से से बोला "तुम्हारी जरूरत नहीं है यहां, अपने बच्चे को मैं खुद संभाल लूंगा.. तुम जाओ यहां से!”

स्नेहा उसकी तरफ देखती ही रह गई! 

वो धीमे से बोली "लेकिन मुझे संगम को रेडी…”

वो अपनी बात

पूरी करती उससे पहले ही अंगद उसकी बात बीच में ही काट कर गुस्से से बोला "मैंने कहा ना जाओ यहां से!” 

उसका गुस्सा देखकर स्नेहा ने दूध का गिलास तुरंत साइड टेबल पर रखा और अगले ही पल वहां से बाहर की तरफ चली गई! उसकी आंखों में आंसू थे। अंगद अभी भी गुस्से से उसे जाते हुए देख रहा था।

मित्तल मेंशन 

स्नेहा संगम के रूम से बाहर आ चुकी थी। उसकी आंखों में आंसू थे। जिस तरह से अंगद ने उसे बाहर जाने के लिए कहा… उसे बहुत बुरा लग रहा था।

 वो तो संगम को उठाने आई थी, उसे स्कूल के लिए रेडी करने आई थी और कल भी तो ऐसा ही हुआ था…. उसने संगम को उठाया था, उसे दूध पिलाया था… तब तो अंगद ने कुछ नहीं कहा तो आज आखिर ऐसा क्या हो गया, जो अंगद उस पर इतना भड़क गया!

 उसे अंगद समझ ही नहीं आ रहा था। वो वापस अपने रूम की तरफ जा रही थी। तभी सुमित्रा जी ने उसकी तरफ देखते हुए उसे रोका और बोली "कहां जा रही हो तुम स्नेहा? वो एक्चुअली मैं तुम्हें बुलाने के लिए आ रही थी! आज तुम्हारी पहली रसोई की रस्म होने वाली है तो मैं पूछ रही थी तुमसे… तुम करोगी ना बेटा ये रस्म?”

 उनकी बात सुनकर स्नेहा ने तुरंत अपने आंसुओं को साफ किया और अपना सर हां में हिला दिया। सुमित्रा जी को कुछ अजीब लगा।

 वो उसके पास आई और उसके गाल पर अपना हाथ रखकर बोली "क्या हुआ बेटा तुम रो क्यों रही हो?” 

स्नेहा ने बड़ी ही मासूमियत से कहा “मैं संगम को उठाने के लिए उसके रूम में गई थी चाची जी, मैं प्यार से उसे उठा रही थी, लेकिन पता नहीं अचानक से वो रूम में आए और उन्होंने मुझे गुस्से में वहां से जाने के लिए कह दिया… मुझे बुरा लगा बस इसीलिए आंखों में आंसू आ गए!”

 सुमित्रा जी उसे गहरी नजरों से देखते हुए बोली "मैं जानती हूं स्नेहा… तुम संगम को एक मां का प्यार ही देना चाहती हो लेकिन वो क्या है ना कि सौतेली मां… ये शब्द जहां आ जाता है ना, वहां पर  यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है... की कहीं तुम भी बाकी सारी सौतेली मांओ की तरह संगम से बुरा व्यवहार ना करो शायद इसीलिए अंगद को तुम पर यकीन नहीं होगा। कोई बात नहीं… तुम धीरे-धीरे उसका विश्वास जीत लेना…”

स्नेहा उनकी बातें सुनकर हैरान रह गई….. वो तुरंत बोली "लेकिन ऐसा क्यों चाची जी... मैंने तो ये शादी ही संगम के लिए की है! मैं सच में संगम को एक मां का प्यार देना चाहती हूं..” 

सुमित्रा जी तुरंत बोली "वो तो अब की बात है ना स्नेहा… कल को जब तुम्हारा बच्चा हो जाएगा, तो तुम कहां उसे वो प्यार दे पाओगी… जो एक मां अपने बच्चों को देती है? फिर तो तुम्हारे लिए अपना बच्चा ही सब कुछ होगा।।। संगम तो तुम्हें सौतेला लगेगा ही!”

 उनकी इस बात ने स्नेहा को और भी ज्यादा हैरान कर दिया था! 

अब उसे समझ में आया कि क्यों अंगद ने उसे वो नो प्रेगनेंसी पिल्स दी क्योंकि वो नहीं चाहता स्नेहा प्रेगनेंसी कंसीव करें और उसे बच्चे हो…

 ताकि वो कभी संगम के साथ सौतेली मां वाला व्यवहार ना करें, ये बात जानते हुए अब उसे और भी ज्यादा रोना आ रहा था लेकिन उसने हिम्मत की और हल्का सा मुस्कुरा कर बोली "मैं ऐसा कभी नहीं करूंगी चाची जी, अगर उन्हें ऐसा लगता है कि मैं संगम के साथ कभी कोई भेदभाव करूंगी तो मैं कभी अपना बच्चा करूंगी ही नहीं! मुझे संगम की सौतेली मां नहीं… उसकी अपनी मां बनना है और उसे बहुत सारा प्यार देना है... आप मुझे बता दीजिए, मुझे क्या बनाना है, मैं बना दूंगी!”

सुमित्रा जी मुस्कुराई और बोली "तुम किचन में चलो… मैं शारदा दीदी से कहती हूं, वो आकर तुम्हें बता देंगी तुम्हें क्या-क्या बनाना है?”

 उनकी बात पर स्नेहा ने अपना सिर हिलाया और चुपचाप किचन में चली गई।

 वहीं दूसरी तरफ 

अंगद संगम के साथ था और उसने उसे शावर दिलाया। वो बेशक से कभी कुछ नहीं करता था… उसे तो आदत ही नहीं थी!! अपना एक कपड़ा भी उठाकर इधर से उधर करने की लेकिन संगम के लिए वो हर एक काम करता था… उसने टॉवेल में लिपटे हुए संगम को बेड पर खड़ा किया और फिर उसे स्कूल यूनिफॉर्म पहनाने लगा। 

कुछ ही देर में 

वो संगम को स्कूल के लिए रेडी कर उसे बाहर की तरफ लेकर आया। बाहर आते ही उसे बहुत अच्छी खुशबू महसूस हुई। एक पल के लिए उसके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई लेकिन अगले ही पल उसकी आंखें गहरी लाल हो गई…. ये वही खुशबू थी, जो उसे तब आती थी… जब तनुश्री उसके लिए खाना बनाती थी... 

सुमित्रा जी ने उसे देखा तो मुस्कुराते हुए बोली "आज खाना स्नेहा बना रही है और मैंने सुना है वो बहुत टेस्टी खाना बनाती है… आज तो मजा आ जाएगा! पहली रसोई है उसकी… तुम तोहफा तैयार रखना अंगद!”

 ये बोलकर वो मुस्कुराते हुए किचन में चली गई और अंगद का चेहरा एकदम एक्सप्रेशन लेस हो गया लेकिन उसकी आंखों के सामने कुछ तस्वीरें चल रही थी... 

जहां एक डाइनिंग टेबल पर सब लोग बैठे आराम से अपना खाना एंजॉय कर रहे थे। एक लड़की सबको खाना सर्व कर रही थी और उसके हाथों में भरी हुई चूड़ियां, मांग में सिंदूर, गले में ज्वेलरी और लाल साड़ी बता रही थी कि शायद ये शादी के बाद उसकी पहली रसोई की रसम है!

 उसने खाना इतना स्वादिष्ट बनाया था कि सब ने उसे बहुत सारे तोहफे दिए और फिर एक तोहफा मिला उसे उसके रूम में... 

वो लड़की कोई और नहीं तनुश्री ही थी। तनुश्री रूम में आईने के सामने खड़ी थी और अंगद ने उसे पीछे से अपनी बाहों में भर लिया था...

तनुश्री ने शर्माते और मुस्कुराते हुए आईने में एक नजर अंगद की तरफ देखा…. उन दोनों की अरेंज मैरिज ही थी लेकिन शादी से पहले कुछ वक्त मिला तो वो शादी अरेंज मैरिज से लव मैरिज में बदल गई! शादी होते हुए दोनों में इतना प्यार हो गया था कि अब वो दोनों एक दूसरे की धड़कन बन चुके थे... 

अंगद आईने में तनुश्री को देखते हुए बोला "सब ने पहली रसोई का गिफ्ट दिया तुम्हें… मुझसे गिफ्ट नहीं चाहिए क्या?”

तनुश्री मुस्कुराई और बोली "आप मेरे पास है ना… मुझे इसके अलावा और क्या ही चाहिए होगा!”

 अभी वो बोल ही रही थी कि अंगद ने उसे गोल घुमाया और अपने सामने कर लिया। अगले ही पल उसका हाथ तनुश्री की पीठ पर था और तनुश्री की धड़कनें एकदम से बढ़ गई थी।

 अंगद उसके चेहरे पर झुका और बोला "लेकिन मुझे तो मेरी जान को गिफ्ट देना है ना!”

ये बोलते हुए उसने अपनी पॉकेट में हाथ डाला और एक खूबसूरत सा ब्रेसलेट बाहर निकाला, जो उसकी उंगलियों में लटक रहा था। उसे देखते ही तनुश्री के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई।

 वो उन दोनों के नाम का ब्रेसलेट था। वो मुस्कुराते हुए बोली "ये आप मेरे लिए लाए हैं अंगद जी?”

 अंगद मुस्कुराया और अगले ही पल उसने वो ब्रेसलेट तनुश्री के हाथ में पहना दिया..! 

लेकिन फिर अचानक से ही वक्त एकदम से बदल गया… अब अंगद के सामने तनुश्री दर्द से तड़पती हुई दिखाई दे रही थी… उसका हाथ अंगद के हाथ में था और वो दर्द से तड़पते हुए बोल रही थी “मैं मरना नहीं चाहती अंगद जी... प्लीज, प्लीज मुझे बचा लीजिए… मुझे मुझे आपके साथ जीना है... मुझे… मुझे हमारे संगम को अपनी गोद में उठाना है!”

ये बोलते हुए उसने अपना हाथ अपने पेट पर रखा था और ये वो वक्त था…. जब एक अनहोनी की वजह से अंगद की खुशियां मातम में बदल गई थी.... 

“क्या हुआ डैड?? आप रुक क्यों गए? मुझे डाइनिंग टेबल पर लेकर चलिए ना… मुझे ब्रेकफास्ट करना है, फिर मुझे स्कूल भी जाना है… मुझे देरी हो जाएगी!”

 ये बोलते हुए संगम अंगद का हाथ खींच रहा था। अंगद एकदम से अपनी यादों से बाहर आया... 

उसने संगम की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए उसे अपनी गोद में उठा लिया लेकिन उस तरीके से नहीं जैसे वो हमेशा उसे अपनी गोद में उठता था… बल्कि इस वक्त उसने उसे अपनी गोद में बहुत ही ज्यादा कसकर पकड़ हुआ था… संगम को घुटा घुटा महसूस हो रहा था।

वो तुरंत बोला “क्या कर रहे हैं आप डैड, मुझे पेन हो रहा है?!” 

तभी एक आवाज और भी आई “आप क्या कर रहे हैं… छोड़िए संगम को… उसे सच में दर्द हो रहा होगा!”

 ये बोलते हुए स्नेहा ने संगम को अंगद की गोद से ले लिया। संगम को स्नेहा की गोद में देख और वो भी जिस तरह से स्नेहा ने संगम को खींचा था…. वो देखकर ही अंगद की आंखें बड़ी हो गई थी! उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

 वो चिल्लाते हुए बोला "हाउ डेयर यू… तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई मुझसे संगम को खींचने की… समझती क्या हो तुम खुद को? मतलब मेरा शक सही था… तुम मुझसे मेरा बेटा छीनना चाहती हो…”

उसकी बात सुनकर न सिर्फ स्नेहा… बल्कि वहां पर खड़े सब लोग हैरान रह गए थे! पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर इकट्ठा हो चुका था! 

स्नेहा को एंब्रेसमेंट फील होने लगी! 

शारदा जी तुरंत आगे आई और गुस्से से अंगद को देखते हुए बोली "तुम क्या बोल रहे हो अंगद? तुम होश में तो हो… तुमने सच में संगम को बहुत ज्यादा कसकर पकड़ हुआ था, उसका दम घुट रहा था… तुम्हें उसकी आंखों से बहते हुए आंसुओं से दिखाई नहीं दे रहे क्या?”

उनकी बात सुनकर अब अंगद ने संगम की आंखों में देखा… वो सच में रो रहा था! वो रोते हुए बोला "डैड मुझे सच में पेन फील हो रहा था!”

न सिर्फ संगम बल्कि स्नेहा की आंखों में भी आंसू थे! उसने संगम को अब अंगद की तरफ बढ़ा दिया और बोली “गलती हो गई, आइंदा से नहीं करूंगी!”

ये बोलकर वो नमी भरी आंखों के साथ ही फीका सा मुस्कुराई। अंगद ने तुरंत संगम को उससे ले लिया था और वापस संगम के रूम में चला गया था और जाते-जाते दरवाजा भी बंद कर गया था।

 स्नेहा बस उसकी तरफ देखती ही रह गई।

 शारदा जी तुरंत उसके पास आई और बोली “उसकी बातों का बुरा मत मानना… जरूर उसका वो मतलब नहीं होगा, शायद काम को लेकर थोड़ा डिस्टर्ब होगा इसलिए तुम पर गुस्सा कर बैठा!”

 स्नेहा मुस्कुराई और बोली “मैं बुरा नहीं मानूंगी सासू मां आप फिकर मत कीजिए!”

शारदा जी ने बड़े ही प्यार से उसका चेहरा दुलारा और बोली “तुम बहुत समझदार हो बेटा! और मुझे पूरा यकीन है अपने प्यार और इस समझदारी से तुम अंगद के दिल में अपने लिए जगह बना ही लोगी।” 

उनकी बात सुनते हुए स्नेहा सामने संगम के रूम की तरफ देख रही थी! वो जगह तो तब बनाये ना अगर उसे अंगद मौका भी दे लेकिन वो तो उसे मौका भी नहीं दे रहा था... उसने ऐसा सोच भी कैसे लिया कि वो कभी संगम के साथ पार्शियल्टी करेगी?

 ये जानते हुए भी कि उसके लिए इस शादी की वजह ही संगम है!

तभी निया वहां पर आई और बोली “भाई तो संगम के साथ उसके रूम में चले गए… क्या अब भाभी की पहली रसोई की रस्म नहीं होगी? मेरा मतलब है बिना भाई के ये रस्म थोड़ा अजी

ब नहीं लगेगा क्या बड़ी मां?”

ये बोलते हुए वो शारदा जी को देख रही थी और शारदा जी के चेहरे पर भी सवालिया एक्सप्रेशन थे

उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब वो अंगद को स्नेहा की पहली रसोई रस्म के लिए कैसे बुलाएं?

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